४६वीं मुलाकात…दोस्ती जिंदाबाद|

By Vivek Gulati

छियालीसवीं मुलाक़ात, वही यारों का प्यार,

गोवा के समुद्र तट पर, फिर सजा दोस्ती का दरबार।

1980 से चला सिलसिला, आज भी बरकरार,

साल गुज़रते रहे, पर कम न हुआ मिलने का ख़ुमार।

दुनिया के कोने-कोने से खिंचे चले आए यार,

किसी के पास बड़ी ज़िम्मेदारियाँ, किसी के ओहदे शानदार।

पर दोस्तों की महफ़िल में सब एक समान,

न कोई छोटा, न कोई बड़ा, बस दोस्ती की पहचान।

कभी पुरानी यादों के पन्ने खुलते रहे,

कभी हँसी के ठहाकों में लम्हे घुलते रहे।

किस्से वही पुराने, शरारतें वही पुरानी,

हर चेहरे पर दिखी स्कूल के दिनों की निशानी।

गोल्फ के मैदान में भी हुनर आज़माया,

किसने कितना अच्छा खेला, किसने किसको हराया।

कहीं निशाने की चर्चा, कहीं हँसी-मज़ाक़ की बात,

खेल से ज़्यादा प्यारी थी दोस्तों की सौगात।

और तस्वीरों का दौर तो कुछ ख़ास ही रहा,

हर नया लिबास जैसे नया अंदाज़ कहता रहा।

हर सेशन में नए कपड़े, हर तस्वीर लाजवाब,

कैमरे भी सोचते होंगे—अब बस भी करो जनाब!

ख़ासकर हमारी लड़कियों का अंदाज़ निराला,

हर तस्वीर में नया रंग, हर अदा मतवाला।

क्लिक पर क्लिक हुए, मुस्कानें रहीं बरकरार,

लगता था यादों को समेटने का है त्योहार!

तीन दिनों की ये महफ़िल, कितनी यादें दे गई,

बिछड़ते वक़्त हर आँख में अगली मुलाक़ात कह गई।

फिर अपनी-अपनी दुनिया, फिर कामों की रफ़्तार,

पर दिल में बसी रहेगी गोवा की ये बहार।

छियालीस साल की यारी कोई छोटी बात नहीं,

वक़्त बदला, दौर बदला, पर बदले जज़्बात नहीं।

हर साल यूँ ही मिलते रहें, खिलती रहे मुस्कान,

AFCS-80 बैच की दोस्ती रहे सदा जवान!

उम्र के साल बढ़ें, पर यारी का रंग न ढले,

हर साल मिलें ये दोस्त, और दोस्ती के दीप यूँ ही जलें।

दोस्ती ज़िंदाबाद!

AFCS-80 बैच — हमेशा जवान, हमेशा साथ!

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